भारतीय रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य  ने 2010 में अर्जेंटीना के वित्त संकट का हवाला क्यों दिया कि केंद्रीय बैंक और सरकार के बीच जब विवाद हुआ तो केंद्रीय बैंक के गवर्नर से इस्तीफा दे दिया और फिर वहां आर्थिक तबाही मच गई। एक समझदार सरकार अपने तात्कालिक सियासी फायदे के लिए एक ऐसी संस्था को कमतर नहीं करेगी जो देश के दूरगामी हितों की रक्षा करती है। इसका संदर्भ समझने के लिए हमें रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल और डिप्टी गवर्नर एन एस विश्वनाथ के पब्लिक में दिए गए बयानों को देखना होगा। ब्लूमबर्ग वेबसाइट पर इरा दुग्गल ने बताया है कि कम से कम चार मौकों पर रिज़र्व बैंक के शीर्ष अधिकारी पब्लिक को साफ साफ संकेत दे चुके हैं कि रिज़र्व बैंक के रिज़र्व पर नज़र टेढ़ी की जा रही है। मीडिया, विपक्ष और सरकार सबने इस कठोर बयान को नोटिस नहीं किया।

आप जानते हैं कि मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसद की आंकलन समिति बैंकों के एनपीए की पड़ताल कर रही है। इस कमेटी को रघुराम राजन ने 17 पन्नों का नोट भेजा और बताया कि उन्होंने कई कंपनियों की सूची प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय को दी थी। ये वो कंपनियां हैं जो लोन नहीं चुका रही हैं और लोन का हिसाब किताब इधर उधर करने के लिए फर्ज़ीवाड़ा कर रही हैं। इसकी जांच के लिए अलग-अलग एजेंसियों की ज़रूरत है। रिज़र्व बैंक अकेले नहीं कर सकता। दि वायर के धीरज मिश्र की रिपोर्ट है कि रिज़र्व बैंक ने सूचना के अधिकार के तहत इस जानकारी की पुष्टि की है कि राजन ने अपना पत्र 4 फरवरी 2015 को प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दिया था. इस पत्र में उन बकायदारों की सूची थी, जिनके खिलाफ राजन जांच चाहते थे। प्रधानमंत्री मोदी यही बता दें कि राजन की दी हुई सूची पर क्या कार्रवाई हुई है।

हाल ही में जब IL&FS ने लोन चुकाने की डेडलाइन मिस की थी तो बाज़ार में हड़कंप मच गया था। ये वो संस्थाएं हैं जो बैंकों से लेकर आगे लोन देती हैं। रिज़र्व बैंक पर दबाव इसलिए भी डाला जा रहा है ताकि वह इन संस्थाओं में पैसे डाले और यहां से खास उद्योपतियों को कर्ज़ मिलने लगे। मगर रिज़र्व बैंक ने तो अगस्त में इन संस्थाओं पर भी फरवरी का सर्कुलर लागू करने की बात कही थी, लगता है कि इस मामले में रिज़र्व बैंक ने अपना कदम रोक लिया है। तो ऐसा नहीं है कि दबाव काम नहीं कर रहा है।

NBFC/HFC को दिसंबर तक 2 लाख करोड़ का बकाया चुकाना है। उसके बाद जनवरी मार्च 2019 तक 2.7 लाख करोड़ के कमर्शियल पेपर और नॉन कन्वर्टेबिल डिबेंचर का भी भुगतान करना है। मतलब चुनौतियां रिज़र्व बैंक के रिज़र्व को हड़प लेने से भी नहीं संभलने वाली हैं। मीडिया रिपोर्ट है कि सरकार ने रिज़र्व बैंक के 83 साल के इतिहास में पहली बार सेक्शन 7 का इस्तमाल करते हुए रिज़र्व बैंक को निर्देश दिया है। मगर बयान जारी किया गया है कि वह रिज़र्व बैंक की स्वायत्ता का सम्मान करती है और उसकी स्वायत्ता का बना रहना बहुत ज़रूरी है।

 

 

 

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