तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे,तुम मेरी किन किन नयामतों को झुठलाओगे। वैसे इलाहाबाद का अल्लाह मिँया से कुछ लेना देना नहीं है, इलाही धर्म (जैसे आज बहाई धर्म है) कि स्थापना  इलाहाबाद में हुई थी। इस वजह से इसका नाम इलाहाबाद पड़ा जहाँ सारे धर्मों का समागम होकर एक नए धर्म दीन ए इलाही बना। और अकबर ने इसकी धार्मिक महत्ता को देखते हुए यहाँ संगम तट पर किले का निर्माण किया साथ ही साथ प्राचीन प्रयाग जोकि गंगा के तट पर है के समानान्तर एक नए शहर की स्थापना की थीजो मुख्य रूप से यमुना तट पर बसाया गया थाप्रयाग शहर गंगा के किनारे का एरिया आज भी प्रयाग कहलाता है यहाँ तक कि वहाँ का रेलवे स्टेशन प्रयाग स्टेशन है।

शहरीकरण का विचार हिन्दुस्तान में आधुनिक रूप मे दिल्ली सल्तनत के साथ आया, इस तथाकथित आक्रांता सल्तनत ने ही आधुनिक नहर प्रणाली, बाज़ार व्यवस्था, नाली प्रणाली, व्रहत रोड की शुरूआत कियाऐसा माना जाता है और तो और दिल्ली सल्तनत से लेकर मुग़ल सल्तनत तक किसी शहर को विध्वंस कभी नहीं किया गया बल्कि नए-नए शहरों की स्थापना सुव्यवस्थित ढ़ंग से की। इलाहाबाद भी उसकी एक कड़ी है, जो गंगा दोआब का क्षेत्र होने के कारण भू राजस्व के नज़रिए से हमेशा अहम रहा। और यह शहर जल और स्थल दोनों रास्तों से उत्तर भारत के पुरब-पश्चिम दोनों से जोड़ता है।

एक स्कूल की सोच है कि अक़बर ने इलाहाबाद में क़िला बनाने के लिए इसलिए क़दम उठाया ताकि उनकी ग़ैर मुस्लिम बीवियाँ अपने मज़हब के सारे अरक़ान पूरे करें हांलांकि कि एलाहाबाद की सामरिक भौगोलिक स्थिति भी इसकी वजह रही होगी। इस शहर के बारे मे एक भ्रांति शुरू से रही है कि इलाही धर्म का संबध अल्लाह शब्द से है जोकि अरबी शब्द है जिसका हिन्दी अनुवाद भगवान या ईश्वर हो सकता है। जबकि सच यह है कि यहाँ इस्लामी परिचर्चा कभी नही रही और शायद इसी वजह से अक़बर को समकालीन उलेमा की आलोचना का भी शिकार होना पड़ा था। यानी धर्म निरपेक्षता की चुनौती अकबर को अपने जीवन काल मे ही थी। हाँ अल्लाहपुर नाम का एक पुराना मोहल्ला गंगा तट पर ज़रूर है जिसे शायद गंगा नदी और शहर की पवित्रता को ध्यान मे रखकर अल्लाह या भगवान की स्थली कहा गया।

वहीं दूसरी तरफ यह भी सच्चाई है कि कभी इस पूरे इलाक़े मे हिन्दू-मुस्लिम मिलजुल कर रहते थे। आज भी तुरकाने का आबाई क़ब्रिस्तान यहाँ पर है। और इस बात के पूरे ऐतिहासिक साक्ष्य हैं कि खुल्दाबाद का ख़ुसरोबाग 1857 की क्रांति का मुख्य गढ़ था जहाँ से मौलवी लियाक़त अली ने अंग्रेज़ो के खिलाफ़ कमान संभाल रखी थी और यह वही शहर है जहाँ पहला स्वतंत्रता संग्राम गीत‘हिन्दुस्तान हमारा’ की रचना की गई यानी की अल्लामा इक़बाल से दशकों पहले 1857 मे ही। जिसकी वजह से1857 की क्रंाति मे हिस्सा लेने के गुनाह मे ब्रिटिश के प्रकोप का अहम शिकार मुसलमानों को होना पड़ा और इस वजह से इलाहाबाद के कुछ इलाकों से पूरा का पूरा मोहल्ला मुसलमानो का खाली करा लिया गया जिसमे अल्लाहपुर और कमपनी गार्डेन का एरिया जो 1857 से पहलेएक घनी बस्ती हुआ करती थी खाली करा लिया गया। और इन लोगों को वहाँ से विस्थापित करा के पुराना कटरा का तुरकाना मोहल्ला वसाया गया आज भी इस मोहल्ले के लोग अपना आबाई मोहल्ला इसे नही मानते ।

और आज का रसूलपुर जोकि चायल परगना का हिस्सा होता था पूरी तरह से ज़ब्त कर लिया गया और वहाँ के लोगों ने बड़ी तादात मे वहाँ से पलायन किया।  इस तरह से 1857 मे कई सारे भौगोलिक और डेमोग्राफिक तब्दीलियाँ इलाहाबाद मे हुई इस बात का सबूत अभिलेखीय साछ्यों मे भी है किस तरह पूरे के पूरे गंाव व मोहल्ले ब्रिटिश राज्य ने ज़ब्त कर लिया था। ख़ासतौर पर अल्लाहपुर, दारागंज, राजापुर,दरियाबाद, रसूलपुर आज भी यह लोग अपनी खोई विरासत का अफसोस करते है।

कटरा और सिविल लाइन का कांसेप्ट ब्रिटिश अपने साथ लाए थे। कम्पनी गार्डेन की पूरी बस्ती को प्लेन करके वहाँ गार्डेन बनवाया जो बाद मे अल्फ्रेड पार्क बना यहीं1857 के स्तंत्रता संग्रामियों को फांसी पर लटकाया गया। और उससे सटाकर कर्नल गंज, जार्ज टाउन और दरभंगा व बंगाली कालोनी बसाई और 1857 की क्राति मे बंगाल का योगदान क्या था यह सबको पता है शायद यह जवाब दे सके बंगाल से लाकर कटरा के आस पास के एरिया को क्यों आबाद किया गया। कर्नलगंज औरजार्ज टाउन इन्ही विस्थापितों की बस्ती बनी। 1857 की क्रांति ब्रिटिश टाउन प्लानिंग का मुख्य आधार बना कि फिर कभी मंगल पाण्डे व मौलवी लियाक़त एक साथ न खड़े हो सकें। वरना क्यों ब्रिटिश ने मोहल्लों का विस्थापन समुदाय के आधार पर किया। जिसकी परिणति आज मुस्लिम घेटो या दूसरे समुदाय के धर्म विशेष के मोहल्लों मे देखी जा सकती है।

न सिर्फ पहला स्वतंत्रता संग्राम बल्कि उसके बाद इलाहाबाद ब्रितानी सरकार के ख़िलाफ छेड़ी गई मुहिम का केंद्र बन गया, देश को बौद्धिक जागरण मे उत्तर भारत का मुख्य केन्द्र इलाहाबाद रहा, जिसमे इलाहाबाद विश्विधालय का भी अहम रोल रहा जिसका मक़सद तो सिविल सर्वेंट पैदा करना था पर इसने इलाहाबाद की बौद्धिक पुनर्जागरण मे अहम रोल अदा किया। चाहे वह ख़िलाफ़त आंदोलन हो, सविनय अवज्ञा आंदोलन, असहयोग आंदोलन या भारत छोड़ो या स्वदेशी आंदोलन। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्नो मे इलाहाबाद का नाम सुनहरे अक्षरों मे पाया जाता है। आज भी इलाहाबाद संस्क्रति मे पढ़ा-बढ़ा इंसान अपने इलाहाबादी पहचान पर गर्व करता है चाहे वह जिस धर्म, जाति और क्षेत्र का मूलवासी हो।

इलाहाबाद कभी भी एक क्षेत्रीय पहचान नही रही बल्कि एक राजनीतिक और सांस्कर्तिक पहचान रही है चाहे वह आज़मगढ का हो, गाज़ीपुर का या बलिया का (इन जगह के लोग यहाँ बड़ी तादाद मे प्रवास कर चुके है)। इलाहाबाद ने हमेशा आगंतुको का स्वागत किया है और उसे अपनी गंगी ज़मनी तहजीब मे समाहित कर लिया। और मिटांएगे भी तो क्या-क्या। क्या अकबर इलाहाबादी (प्रयागी) को भुलाया जा सकता है। क्या चौक की क़ोतवाली के उस सैकड़ों साल पुराने नीम के पेड़ से उन हज़ारों शहीदों की फाँसी के फंदे पर लटकने की क़ुरबानियाँ भुला सकते हैं जिनमें ज़्यादातर उस इलाहाबाद स्कूल की सोच के लोग थे।कुल मिलाकर 1857 की रिलोकेशन और रिनेमिंग की ब्रितानी जीत अब जाकर अपने अंतिम गंतव्य पर पहुंच गई प्रतीत हो रही है।

किन किन आवाज़ों को दबाँएगे, शहीदों की पेडों पर लटकने के वक़्त की चित्कार, गंगा-यमुना (इलाहाबाद-प्रयाग) की लहरों की कल-कल जो याद दिलाती है हिन्दुस्तान की मिली-जुली तहज़ीब को। या अकबर की नज़्मों को!

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