मोदी सरकार ने 2014 से लेकर जून 2018 तक में गंगा सफाई के लिए 5,523 करोड़ रुपये जारी किए हैं, जिसमें से 3,867 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन इसके बावजूद गंगा नदी का जो रिपोर्ट कार्ड सामने आया है, वो हैरान करने वाला है।

आरटीआई से इस बात की जानकारी भी मिली है कि गंगा नदी में ऑक्सीजन की मात्रा लगातार घट रही है। जिससे पानी में रहने वाले जीवों पर बुरा असर पड़ा है।

दरअसल मोदी सरकार ने गंगा सफ़ाई के लिए 21 हज़ार करोड़ की नमामि गंगे योजना शुरु की थी। जिसमें दावा किया गया था कि 2020 तक  गंगा की 70-80 फीसद सफ़ाई पूरी हो जाएगी। लेकिन इन आंकड़ों को देखने के बाद इस दावे को जुमले से ज़्यादा नहीं समझा जा सकता।

बता दें कि सीपीसीबी साल 1980 से भारत की नदियों के पानी की गुणवत्ता की जांच कर रहा है और इस समय ये 2,525 किलोमीटर लंबी गंगा नदी की 80 जगहों पर जांच करता है। इससे पहले सीपीसीबी 62 जगहों पर गंगा के पानी की जांच करता था।

गंगा सफ़ाई के वादे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार के चार साल बीत जाने के बाद भी गंगा साफ़ होती नज़र नहीं आ रही। मोदी सरकार के शासनकाल में गंगा साफ़ होने की बजाए कई जगहों पर और ज़्यादा दूषित हो गई है।

इस बात की जानकारी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने न्यूज़ पोर्टल द वायर को एक आरटीआई के तहत दी है। जिसके मुताबिक, पहले की तुलना में किसी भी जगह पर गंगा साफ नहीं हुई है, बल्कि साल 2013 के मुकाबले गंगा नदी कई सारी जगहों पर और ज्यादा दूषित हो गई है।

दिलचस्प बात तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी गंगा का पानी 2013 के मुकाबले ज़्यादा दूषित हुआ है। प्रधानमंत्री ने यहां से चुनाव लड़ने से पहले गंगा को साफ़ कराने का संकल्प लिया था। उन्होंने कहा था कि माँ गंगा ने बुलाया है। पर चुनाव जीतने के बाद मोदी जी का ये वादा भी झूठा निकला !

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